थिंक POSITIVE
एक नही कई बार , कितने ही महापुरुषों ने येही बात कही हैं, लेकिन हम उसे मानते ही नही हैं। जैन धर्म वैज्ञानिक अधरों पैर बना हुआ हैं। उद्धरण सबसे पहले देता हूँ उबला हुआ पानी पीने का। हेर डॉक्टर मरीज़ को उबला हुआ पानी पीने को क्यों कहते हैं ? क्यों की ओउर कोई रोग न हो या ओउर कोई भी कीटाणु शरीर में प्रवेश न करे ओउर हमारे शरीर को खोकला न बना दे, अथवा दूसरा कोई रोग की लागत न हो। जैन धरम में यह तो बहुत ही बेसिक तौरपह कहाँ गया हैं की उबला हुआ पानी हीपीना चाहिए क्यों की उस में सारे जीव जंतु का नाश हो जाता हैं। वायरस ओरु बक्टेरिया जैसे कीटाणु नही रहता हैं। तो उससे किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन नही होताहैं। येही बात अगर डॉक्टर कहता हैं तो बस हम मान लेते हैं। लेकिन जीवन की सच्चाई बताने वाले साधू सानों को, गुरुजनों की हम बात नही मानते हैं। धर्म में बताये गए मार्ग को हम शक की नज़र से देखते हैं। हमे हेर वक्त प्रमाण ही चाहिए होते हैं। तो यह एक सबसे बड़ा प्रमाण हैं। अभी तो आप मानेंगे न ?
दूसरा राती भोजन त्याग कहीं हैं। सुयस्त के पहले आप को जानका हैरानी होगी , आपने कभी गौर किया या नही , आसमान में उधानेवाले पंछी भी सूर्यास्त के बाद भोजन नही करते। इसके पीछे विज्ञानं ही हैं। सूर्यास्त के बाद जैसे जैसे अंधेरे छाने लगता हैं वैसे आप गौर करेंगे तो आपके भोजन पैर भी उसका असर पढता जाता हैं। सूरज में जो उल्त्र विओलेट किरणें हैं वोह सारे सुक्ष्म जीवों को नष्ट करता हैं। लेकिन सुयस्त के बाद सुक्ष्म जीव पनपने लगते हैं। दूसरी बात रात को देर से भोजन करने से पाचन प्रक्रिया पैर असर पढता हैं। हमतो भोजन ग्रहण करके सो जाते हैं तो उस में भोजन का दिगेस्ट होना यानि पचाने कीप्रक्रिया पुरी नही होती हैं। फिर एसिडिटी, कब्ज, कांस्तिपेशन, यह सारी शिकायतें की शुरुआत होई जाती हैं। उसके आगे चलकर कोलेस्ट्रोल का बढ़ना ह्रदय रोग में तब्दील होना । रात्री भोजन त्याग से इन सभी नुक्स्सनों से हम बच सखते हैं। हमारा शरीर निरोगी रख सखते हैं। आज के इस दौर में कहीं बड़ी हस्तियाँ, महात्मा, रात्रि भोजन को पुरी तरह नही तो अन्षता ही त्याग करते हैं । ओउर अपनी सेहत को बनाये रखने के लिए जब डॉक्टर कहते हैं तो उसका पालन भी करते हैं। येही बात जैन धर्मं में कहीं गई हैं। आप मानोंगे या नही लेकिन येही सच्चाई हैं। ऐसे बहुत सी बातें हैं जो में आप लोगों के साथ बंटाना चाहता हूँ। प्रमाण की क्या हैं यह तो जीते जागते सबूत हैं जो आम आदमी भी समाज सख्त हैं ओउर आप ओ महा पराक्रमी, महा ज्ञानी इंसान, मनुष्य होई। आपको कोई क्या समझाए, बस याद दिलाते हैं।
जय जिनेन्द्र।
आदमी सोचता कुछ हैं ओउर हो जाता कुछ हैं। हेर कदम एक ज़ंग हैं। इस ज़ंग मैं जो जीता तो भी हारकर, ओउर जो हरा वोह भी हारकर। जीत किसीकी नही होती हैं। येही कुदरत का खेल हैं। जब कोई संत कहते हैं के जा बेटे उस परमेश्वर के चरण में, तो वोह जाता नही हैं, क्यों? क्यों की उसे विश्वास नही होता। और जब जाता हैं तो बहुत देर हो चुकी होती हैं। तब उसे इस बात का भी एहसास नही रहता की अब देर हो चुकी हैं। यहाँ सब कुछ अपने हिसाब से नही चलता हैं। यहाँ पैर उस परमेश्वर का नियम हैं जिसने यह सुंदर शरुष्टी का निर्माण किया । जो उस पैर निरंतर श्रद्धा रखते हैं, वोह कभी निराश नही होते, जियो और जीने दो येही संदेश भगवन महावीर ने दिया। लेकिन आज के दौर मैं हम जिए और तुम्हे मारे येही सब जगह दिखाई पढता हैं। किसी के भी नाम पैर किसी के भी साथ उलझ पढ़ना, येही फितरत हैं इंसान की।
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